अपनी सांस्कृतिक बिरासत व सौंदर्यबोध के कारण ही हिंदी पूरी दुनिया में फैली : प्रो त्रिपाठी

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झांसी। डा. हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के हिंदी और संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी ने कहा कि आज हिंदी पूरे विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा बन चुकी है। लचीली होने के नाते ही यह सर्वग्राह्य बनी। अपनी संास्कृतिक बिरासत और सौंदर्यबोध के कारण ही हिंदी पूरी दुनिया में फैली। इसकी प्रकृति साम्राज्यवादी नहीं वरन अति सहज और उदार है। प्रो. त्रिपाठी शनिवार को बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त हिंदी संस्थान में हिंदी दिवस समारोह और सेवा सप्ताह के उद्घाटन समारोह में बतौर मुख्य अतिथि वहां उपस्थित विद्यार्थियों और शिक्षकों को संबोधित कर रहे थे।
प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि मूल्यों और सांस्कृतिक बिरासत की दृष्टि से हिंदी का स्थान पूरी दुनिया में महत्वपूर्ण है। 21वीं सदी में हिंदी ने अपनी खूबियों की वजह से पूरी दुनिया को अपनी मुट्ठी में कर लिया है। उन्होंने हिंदी के प्रसार में इंटरनेट और सोशल मीडिया के योगदान भी रेखांकित किया। साथ ही विद्यार्थियों को इंटरनेट की खूबियों और खामियों के बारे भी जानकारी दी। उन्होंने इस बात पर चिंता भी जताई कि मोबाइल और कम्प्यूटर के बढ़़ते प्रयोग की वजह से पत्र लेखन की परंपरा पर भी विपरीत असर पड़ा है। यही नहीं अब लोगों का पुस्तकों के साथ रिश्ता कम होता जा रहा है। पुस्तकालय तक जाने वाले विद्यार्थियों की संख्या में कमी आई है। उन्होंने नई पीढ़ी का आह्वान किया कि नई तकनीकी के उपकरणों का प्रयोग सीखने के साथ ही साथ पुस्तकों से भी अपना रिश्ता बनाए रखें हिंदी की परंपराओं और बिरासत को सहेजने में सक्रिय भूमिका निभाएं। हिंदी के प्रचार के साथ ही साथ अन्य क्षेत्रीय लोकभाषाओं को भी विकास के अवसर प्रदान करें।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के प्रो. अवधेश कुमार शुक्ल ने कहा कि हिंदी ने स्वतंत्रता के आंदोलन में भारतीय जनमानस को आपस में जोड़ने में अहम भूमिका निभाई। विविध उदाहरण पेश कर उन्होंने बताया कि आज हिंदी बेहतर दिशा में अग्रसर है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जे.वी. वैशम्पायन ने कहा कि भाषा संप्रेषण का माध्यम है। किसी देश की संस्कृति और सभ्यता को आगे बढ़ाने में भी भाषा का अहम योगदान होता है। उन्होंने हिंदी के प्रसार में हिंदी की फिल्मों और सशस्त्र बल के योगदान को भी रेखांकित किया। प्रो. वैशम्पायन ने कहा कि विषम और विपरीत हालात में हिंदी का सर्वाधिक विकास हुआ। उन्होंने कुछ अहम सुझाव विद्यार्थियों को दिए। उनका पहला सुझाव यह रहा कि हिंदी को नैसर्गिक रूप से विकास का माहौल दिया जाना चाहिए, साथ ही साथ हिंदी भाषी लोगों को देश की दूसरी भाषाओं को भी सीखना चाहिये। किसी भाषा का विरोध करने की जरूरत नहीं है। दूसरी भाषाओं के प्रचलित शब्दों को भी हिंदी में शामिल किया जाए। साथ ही साथ हिंदी साहित्य के स्तर को बढ़ाने के प्रयास निरंतर होते रहने चाहिए।
कार्यक्रम की शुरुआत मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन और पुष्प अर्पण से हुई। शुरुआत में हिंदी विभाग के अध्यक्ष डा. मुन्ना तिवारी ने सभी अतिथियों का गरमजोशी के साथ स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन डा. अचला पाण्डेय ने किया। अंत में डा. पुनीत बिसारिया ने सभी अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस कार्यक्रम में शायर राजकुमार अंजुम, समाजकार्य विभाग के डा. यतींद्र मिश्र, अर्थशास्त्र विभाग की शिल्पा मिश्रा, पत्रकारिता संस्थान के समन्वयक डा. कौशल त्रिपाठी, उमेश शुक्ल, कृषि संस्थान के डा. जितेंद्र बबेले, ललित कला संस्थान की समन्वयक डा. श्वेता पाण्डेय. जयराम कुटार, एनएसएस के कार्यक्रम अधिकारी डा. उमेश कुमार समेत अनेक शिक्षक शिक्षिकाएं और विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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